सिद्धार्थ कांकरिया @ थांदला
थांदला एक ऐसा शहर जो आए दिन किसी ना किसी बात में चर्चा में बना रहता है। चाहे वह प्रॉपर्टी मार्केट हो, शिक्षाऔर स्वास्थ्य सेवाएं हो। राजनीति या नगरीय प्रशासन हो, व्यवसायिक या गैर व्यवसायिक हो। कहीं ना कहीं पूरे प्रदेश में थांदला का नाम हमेशा बना रहता है।
इन दिनों थांदला फिर बूम पर है। इस बार थांदला के बूम पर रहने का कारण बीज मार्केट हैं। बोवनी की सीजन आते ही बीज की बड़ी कंपनियां, जगत सेठ और बाहुबली व्यापारी अपनी मनमानी करते हुए थोड़ी सी लालच के लिए किसानों के साथ धोखेबाजी करते हुए नजर आ रहे हैं। यह इसलिए कहा जा रहा है कि थांदला के तीन बीज व्यापारियों पर लगातार वैधानिक कार्रवाई हुई है। इनमें सूरज, आदिनाथ और नवकार एग्रो एजेंसी शामिल है।
अधिकारी भी मानो अपनी नैतिक जिम्मेदारी भूल कर सब जानते-बुझते भी शिकायत का ही इंतजार कर रहे हैं।
किसान महंगे दाम चुकाने के बाद भी अपराधी की तरह ले जा रहे है बीज
इधर गरीब किसानों की माने तो बोवनी का समय सिर पर आ गया है। ऐसे में बीज नहीं मिले तो खेत खाली ही रह जाएंगे। बीज की कमी बताकर बीज व्यापारी अपने बीजों को एमआरपी से अधिक दामों पर बेच रहे हैं। किसानों की मजबूरी है कि वह महंगे बीज खरीदने के बाद भी एक अपराधी की तरह दबे पांव, मुंह बंद करके, बीज को अपने झोले में छुपाकर खेतों तक पहुंच रहे हैं।
वही जगत सेठ, बाहुबली व्यापारी सीना फुलाकर थांदला के बीच बाजारों में ताल ठोक कर अपने अवैध व्यवसाय को कर रहे हैं। यह कोई इस वर्ष की कहानी नहीं है। यह कहानी पिछले 4 से 5 सालों से चल रही है।
आदिवासी युवाओं ने दिखाया साहस
इस वर्ष आदिवासी युवा सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग करते हुए अपने अधिकारों के प्रति लड़ रहा है। अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास करवाकर व्यापारियों की कारगुजारी बता रहा है। बावजूद इसके यह व्यापार इतनी ही तेजी से फैल रहा है। अनुमान है कि अधिकांश बीज महंगे दामों पर गरीब किसानों के खेत तक पहुंच भी गए है। अब इक्का, दुक्का किसान ही बीज से वंचित है।
अनपढ़ किसानो में समझ तो, व्यापारियों की समझ कहा गई
व्यापारियों का दबी जुबान कहना है। कि इस वर्ष उन्होंने बीज महंगे दामों पर ही मिले हैं। यह महंगे दाम एमआरपी से भी अधिक हैं। इस वजह से वह बीजों को महंगे दामों पर बेच रहे हैं।
अब यहां एक बात सोचने वाली है कि जब गरीब और अनपढ़ किसान को यह पता है। की बीज एमआरपी से अधिक नहीं खरीदना चाहिए। तो क्या पढ़े-लिखे, डिग्रीधारी व्यापारियों को नहीं पता की, हम भी बड़ी कंपनियों या व्यापारियों से एमआरपी से अधिक ऊंचे भाव में माल नहीं खरीदे।
आज जो विरोध गरीब किसान कर रहा है। उस विरोध का साहस बड़ी कंपनियों और व्यापारियों के सामने स्थानीय व्यापारी करते तो शायद यह नौबत ही नहीं आती। तो क्यो ना मान लिया जाए कि पूरे मामले में व्यापारी आपदा में अवसर ढूंढ रहे हैं।
यह वर्ष तो गया अब अगले वर्ष की योजना
अब किसानों की मजबूरी है कि उन्हें यह बीज किसी भी कीमत पर लेना ही पड़ेगा। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी किसान इन बीजों को महंगे दामो पर ले रहा है। इधर फिर जगत सेठ, बाहुबली व्यापारी आने वाले बोवनी वर्ष में गरीब किसानों के साथ धोखाधड़ी की जुगत बैठाने की योजना भी बनाने लग गए है।
कहा गए किसानों और व्यापारियों के मधुर संबंध
एक समय था जब गरीब किसान अपने सुख-दुख में काम आने वाले व्यापारी भाई के लिए किसानी का कुछ अनाज, कंद-मूल, फल-फूल छोटी सी, प्यार भरी झोली में लाया करता था। लेकिन चंद जगत सेठों, बाहुबली व्यापारियों के कारण गरीब ग्रामीणों और व्यापारियों के बीच इतनी वैमनस्यता बढ़ गई है, कि अब ग्रामीण अपने झोले में मोबाइल और माइक रख कर ला रहा है। और अधिकारियों को व्यापारियों का स्केंडल कर उनकी कारगुजारी से अवगत करवा रहा है।
अच्छे व्यापारियों और नगर के जागरूक नागरिकों को सोचना चाहिए कि समय रहते ‘आपदा में अवसर’ खोजने वाले व्यापारी नहीं चेते तो ग्रामीणों और नगरीय व्यापारियों की दूरियां और बढ़ती जाएगी। जिनका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को देखना पड़ सकता है।


