सिद्धार्थ कांकरिया @ थांदला
कुछ ही समय बाद हम आजादी का 77 व स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे। स्वतंत्रता दिवस की खुशियां ‘वातावरण’ में अभी से देखने को मिल रही है। कुछ दिनों पहले स्टेशनरी दुकानों की शोभा बने तिरंगे अब वाहनों, प्रतिष्ठानों, घरों और तमाम पब्लिक प्लेस की शान में लहरा रहे हैं। बहुत ही जल्द शासकीय, अर्धशासकीय और विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों पर तिरंगे फहरा दिए जाएंगे। लेकिन क्या यह सब महज 24 से 48 घंटे के लिए है। या इसे हमें पूरे वर्ष, हमेशा अपने जहन में लहराने के लिए हम स्वतंत्र हो गए हैं।
77वां स्वतंत्रता दिवस कई माइनो में आजादी के इतने लंबे समय का संघर्ष दिखता है। तो कई माइनो में यह बताता है कि हम आज भी इतना आगे नहीं बढ़ सके हैं। जितना आजादी के संघर्ष पर गर्व कर सके।
झाबुआ हिट आपको दो ऐसी तस्वीरों को बता रहा है। जिन्हें देखकर हम अपनी आजादी पर गर्व कर सकते हैं। तो एक तस्वीर ऐसी भी है जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देगी कि विकास के कौन से रथ पर बैठकर हम दुनिया के सामने विश्व गुरु बनने की बात कर रहे हैं।

*जिले की शान बना 8 लेन*
आजादी के लंबे समय बाद तक झाबुआ जिला जहां पगडंडियों, कच्चे रास्तों के लिए जाना जाता था। वहीं अब जिले में लगभग हर जगह सड़कों का जाल बिछ गया है। जिले से होकर गुजर रहा 8 लेन एक्सप्रेस वे पूरे देश की उपलब्धियों का फर्राटेदार बखान कर रहा है। एक्सप्रेस-वे का जिले के मध्य से होकर गुजरना जिले की अब उस पहचान को कोसों दूर कर देगा। जहां कभी सड़कों का नामो-निशान नहीं था। साथ ही दिल्ली-मुंबई को सीधे रुप से जोड़ने वाले इस एक्सप्रेस-वे से अंचल के ग्रामीण भी विकास की मुख्यधारा में सीधे रुप से जुड़ जाएंगे। ग्रामीणों की वो पुश्ते जो आजादी की लड़ाई में सीधे रुप से जुड़ने के बाद भी अपनी पहचान स्थापित नहीं कर पाई। शायद यही वजह है कि उपेक्षा का लंबे समय तक दंश झेलने के बाद अब राजनीतिक दल उन्हें सम्मान दिलाने के लिए आदिवासी सम्मान यात्रा, आदिवासी स्वाभिमान यात्रा, तो विश्वआदिवासी दिवस, आदिवासी गौरव दिवस के रूप में उनकी उस तथाकथित पहचान को विश्व पटल के सामने ला रहे हैं। जिस पहचान को आदिवासी वर्ग स्वयं के पुरुषार्थ से कोसों दूर कर विकास की उस दौड़ में शामिल हो गया है जो महानगरों की उन बहुमंजिला इमारतों में दिखती है। जिनकी नीव आदिवासी वर्ग के उन विद्यर्थियों ने इंजीनियर बनकर रखी है।
आजादी के 77 वर्ष बाद यह इस जिले के लिए गर्व का विषय है कि दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों को जोड़ने की अहम भूमिका हमारे जिले ने निभाई है। निश्चित ही इस एक्सप्रेसवे से पूरे अंचल का विकास भी उसे गति से होगा। जिस गति से इस एक्सप्रेसवे पर वाहनों का आवागमन रहेगा।
पलायन

जिले के लिए अभिशाप बन चुका पलायन आजादी के पहले से चला आ रहा है। आजादी के बाद से अंचल के ग्रामीणों को ‘आंस’ है कि उनका अपने घर, गांव को छोड़कर पलायन पर जाना जल्द ही बंद होगा। लेकिन विडंबना है कि आजादी के 77 वर्ष में तमाम सरकारे आई। इन सरकारों ने आदिवासी वोट बैंक का अपने-अपने हिसाब से भरपूर उपयोग कर उन्हें फिर फटे हाल छोड़ दिया। आजादी के इतने वर्षों बाद भी पलायन का यह अनचाहा जहर ग्रामीण आदिवासियों को पीढ़ी दर पीढ़ी पीना पड़ रहा है। अंचल में रोजगार लाने की बात चुनावी वर्ष में पूरी ताकत से गूंजती है। तमाम राजनीतिक दल अपने-अपनी कल्पना शक्ति से पलायन रोकने और अंचल में ही रोजगार दिलवाने की बात के सपने दिखाते है। इसके इतर सच्चाई कुछ और ही है। आज भी कई ग्रामीण परिवार अपने दूधमुंहे और मस्ती की पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों को लेकर या उन्हें अपने सगे-संबंधियों के पास छोड़कर पलायन पर जाने को विवश है। अपने और अपने के बीच से पलायन पर जाने का दर्द उन स्थापित कैंप की याद दिला देता है। जो कभी आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में देखने को मिला था। आज भी अंचल के हजारों परिवार पलायन के कई ऐसे दर्द झेल रहे हैं। जिन दर्द की कई घटनाओं में से इक्का दुक्का घटनाएं हमें पुलिस एफआईआर में पढ़ने को मिल जाती है।
सही माइनो में आजादी हम उसे ही कह सकते हैं जहां एक स्वस्थ, खुशहाल परिवार अपने और अपनों के बीच रहकर पलायन और कुपोषण शब्द से कोसों दूर विकास की ऐसी गाथा लिखेगा। जो हमें देशभक्ति के उन गानों में सुनने मिलती है। जिन्हें सुनकर हम उसी प्रकार आनंदित और प्रफुल्लित होते हैं। जैसे स्वर्गलोक की कल्पना मात्र से।
हालांकि आजादी के 77 साल बाद अंचल में जहां सीएम राइस स्कूल आई है। वहीं जिले में एक भी मेडिकल और लॉ कॉलेज की अनुपलब्धता है। जिले में बड़े-बड़े सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तो खुल गए हैं। लेकिन चिकित्सकों का अभाव अभी भी हमें देखने को मिल रहा है। महिलाओं के शोषण को रोकने के तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। बावजूद इसके पूरे जिले में कहीं ना कहीं थाने या चौकियो पर महिला उत्पीड़न के आवेदन पहुंच रहे हैं। अभी भी झाबुआ और आसपास के क्षेत्र के ग्रामीण ट्रेन की उसे आवाज को सुनने के लिए बेताब है। जिसकी नीव तत्कालीन प्रधानमंत्री और रेल मंत्री ने स्वयं वर्ष 2008 में रखी गई थी। वही आज भी आधार कार्ड करेक्शन के लिए सेंटरों पर दिख रही लंबी कतारें उस असफलता की ओर इशारा कर रही है। जिसमे शिक्षित और कम्प्यूटर पर महारथ हासिल किए लोगों ने लाखों आधारकार्ड को गलत बना दिया है।
यदि आजादी के बाद विकास की बात करें तो पूरे जिले में विकास की गाथा लिखने में राजनीतिक दलों से ज्यादा आदिवासी, ग्रामीण और शहरी नागरिकों के पुरुषार्थ का योगदान ज्यादा माना जाएगा।


