सिद्धार्थ कांकरिया @ थांदला
17 अप्रैल की भोर, सुबह 4:30 बजे, जब अधिकांश लोग नींद में थे, उसी समय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामा से 2 माह के नन्हे शिशु सोमला, पिता गुड्डू वाहुनिया, निवासी धामनदा को जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष की स्थिति में जिला चिकित्सालय झाबुआ रेफर किया गया।
जिला चिकित्सालय पहुंचते ही शिशु को तत्काल पीआईसीयू में भर्ती कर ड्यूटी पर मौजूद शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप चोपड़ा एवं डॉ. विनोद कुमार मुवेल द्वारा गहन जांच कर उपचार प्रारंभ किया गया। जांच में शिशु मस्तिष्क ज्वर (इन्सेफेलाइटिस) से पीड़ित पाया गया, जिसके कारण उसे बार-बार झटके आने लगे और उसकी सांसें थमने लगीं।

स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए चिकित्सकों ने बिना समय गंवाए शिशु को वेंटिलेटर सपोर्ट पर लिया और कृत्रिम श्वसन के माध्यम से जीवन की डोर थामे रखी। लगातार 5 दिनों तक शिशु का उपचार वेंटिलेटर पर चलता रहा, जहां हर पल चिकित्सकीय टीम उसकी जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष करती रही।
धीरे-धीरे उपचार का असर दिखने लगा। वेंटिलेटर से हटाने के बाद अगले 7 दिनों तक शिशु को गहन निगरानी में रखते हुए मस्तिष्क ज्वर का समुचित इलाज किया गया। यह समय चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के धैर्य, समर्पण और विशेषज्ञता की असली परीक्षा थी।
पीआईसीयू में ड्यूटी पर कार्यरत शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. नवीन बामनिया, डॉ. भावेश परमार, डॉ. सहादर अखाड़े तथा समस्त नर्सिंग ऑफिसर्स के अथक प्रयासों, संवेदनशीलता और टीमवर्क के चलते आखिरकार वह पल आया, जब थमती सांसों ने फिर से जीवन की लय पकड़ ली।
आज शिशु पूरी तरह स्वस्थ है। और उसे सुरक्षित घर भेज दिया गया है। यह सफलता न केवल चिकित्सकीय दक्षता का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि समर्पण और सेवा भाव से किसी भी कठिन चुनौती को पार किया जा सकता है।


